परिचय
भारत में ऐसे बहुत कम लोग हैं जिन्होंने शिक्षा, पर्यावरण और समाज—तीनों क्षेत्रों में एक साथ प्रभाव छोड़ा हो। सोनम वांगचुक उन्हीं चुनिंदा लोगों में से एक हैं। उन्हें केवल एक इंजीनियर या शिक्षक कहना उनके काम को छोटा कर देना होगा। वे एक ऐसे सामाजिक नवाचारक (Social Innovator) हैं जिन्होंने यह साबित किया कि अगर शिक्षा को स्थानीय जरूरतों से जोड़ा जाए तो वह पूरे समाज की दिशा बदल सकती है।
आज जब पूरी दुनिया Climate Change, Water Crisis और बेहतर Education System की बात कर रही है, तब सोनम वांगचुक का काम पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। लद्दाख जैसे कठिन भौगोलिक क्षेत्र में रहकर उन्होंने ऐसे समाधान विकसित किए जिन्हें दुनिया भर में सराहा गया।
कई लोग उन्हें फिल्म 3 Idiots के “Phunsukh Wangdu” किरदार से जोड़कर जानते हैं, लेकिन उनकी वास्तविक पहचान इससे कहीं बड़ी है। उनका जीवन संघर्ष, प्रयोग, धैर्य और समाज सेवा का उदाहरण है।
इस लेख में हम उनके जीवन, शिक्षा, SECMOL, Ice Stupa, पर्यावरण संरक्षण, लद्दाख आंदोलन और उनकी उपलब्धियों को विस्तार से समझ
सोनम वांगचुक कौन हैं?
सोनम वांगचुक एक भारतीय इंजीनियर, शिक्षा सुधारक (Education Reformer), नवाचारक (Innovator) और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। उनका जन्म लद्दाख में हुआ और उन्होंने अपना अधिकांश जीवन वहीं के लोगों के लिए काम करते हुए बिताया।
उनकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि उन्होंने शिक्षा को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखा। उनका मानना है कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बच्चों को अपने आसपास की समस्याओं को समझने और उनका समाधान खोजने के लिए तैयार करे।
इसी सोच के साथ उन्होंने SECMOL (Students’ Educational and Cultural Movement of Ladakh) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह संस्था आज दुनिया भर में वैकल्पिक शिक्षा (Alternative Education) का एक सफल उदाहरण मानी जाती है।
इसके अलावा उन्होंने Ice Stupa जैसी अनोखी तकनीक विकसित की, जिससे लद्दाख में पानी की कमी से जूझ रहे किसानों को राहत मिली। उनका यह नवाचार Climate Change के दौर में जल संरक्षण का एक प्रभावी मॉडल माना जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने लद्दाख के पर्यावरण, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन भी किए, जिससे देशभर का ध्यान इस क्षेत्र की चुनौतियों की ओर
बचपन और प्रारंभिक जीवन
सोनम वांगचुक का जन्म 1 सितंबर 1966 को लद्दाख के अलची (Alchi) गाँव में हुआ। उस समय लद्दाख में शिक्षा की सुविधाएँ बहुत सीमित थीं। गाँवों में न तो पर्याप्त स्कूल थे और न ही आधुनिक संसाधन।
उनकी शुरुआती पढ़ाई भी आसान नहीं रही। बचपन में वे केवल अपनी मातृभाषा लद्दाखी जानते थे, जबकि स्कूल में पढ़ाई हिंदी और अंग्रेज़ी में होती थी। भाषा की इस समस्या के कारण उन्हें शुरुआती वर्षों में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
यही अनुभव बाद में उनके शिक्षा सुधार के विचारों की नींव बना। उन्होंने महसूस किया कि भारत के कई हिस्सों में बच्चे इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि शिक्षा उनकी भाषा और स्थानीय परिस्थितियों से जुड़ी नहीं होती।
यहीं से उनके मन में यह विचार पैदा हुआ कि शिक्षा को बच्चों के जीवन और समाज से जोड़ना
शिक्षा
स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद सोनम वांगचुक ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उन्होंने National Institute of Technology (NIT), Srinagar (तत्कालीन Regional Engineering College) से Mechanical Engineering में शिक्षा प्राप्त की।
इंजीनियर बनने के बाद उनके पास अच्छे करियर के कई अवसर थे। वे चाहें तो किसी बड़ी कंपनी में नौकरी कर सकते थे, लेकिन उन्होंने एक अलग रास्ता चुना।
उन्होंने अपने गृह क्षेत्र लद्दाख लौटकर वहाँ की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने का निर्णय लिया।
यही फैसला उनके जीवन का सबसे महत्वपूर
शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाने की शुरुआत
1990 के दशक में लद्दाख के सरकारी स्कूलों की स्थिति काफी चिंताजनक थी। दसवीं कक्षा के बोर्ड परीक्षा परिणामों में अधिकांश विद्यार्थी असफल हो जाते थे।
बहुत से लोग इसका कारण बच्चों की क्षमता को मानते थे, लेकिन सोनम वांगचुक की सोच अलग थी।
उन्होंने पाया कि असली समस्या बच्चों में नहीं बल्कि शिक्षा प्रणाली में थी।
- पढ़ाई स्थानीय जीवन से जुड़ी नहीं थी।
- भाषा बच्चों के लिए कठिन थी।
- रटने (Rote Learning) पर अधिक जोर था।
- Practical Learning लगभग नहीं थी।
उन्होंने स्थानीय शिक्षकों, अभिभावकों और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर शिक्षा में सुधार की दिशा में काम शुरू किया।
उनका उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक दिलाना नहीं था, बल्कि बच्चों को जीवन के लिए तैयार करना था।
उन्होंने ऐसी शिक्षा का समर्थन किया जिसमें बच्चे खेती, विज्ञान, पर्यावरण, ऊर्जा, स्थानीय संस्कृति और तकनीक को वास्तविक जीवन में समझ सकें।
धीरे-धीरे इस मॉडल के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे। विद्यार्थियों का आत्मविश्वास बढ़ा और परीक्षा परिणामों में भी सुधार देखने को मिला।
यहीं से एक ऐसे आंदोलन की शुरुआत हुई जिसने आगे चलकर SECMOL जैसी संस्था का रूप लिया और लद्दाख की शिक्षा व्यवस्था में नई सोच पैदा की।
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SECMOL क्या है? लद्दाख की शिक्षा में एक नई सोच
अगर सोनम वांगचुक के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण कार्य की बात की जाए, तो उसमें SECMOL (Students’ Educational and Cultural Movement of Ladakh) का नाम सबसे पहले आता है। यह केवल एक शैक्षणिक संस्था नहीं है, बल्कि एक ऐसा आंदोलन है जिसने यह साबित किया कि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ़ डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि जीवन की समस्याओं का समाधान ढूँढना भी होना चाहिए।
SECMOL की शुरुआत वर्ष 1988 में कुछ युवाओं और शिक्षकों के सहयोग से हुई। उस समय लद्दाख में सरकारी स्कूलों के दसवीं बोर्ड परीक्षा परिणाम बेहद खराब थे। कई विद्यार्थी असफल हो जाते थे और समाज में यह धारणा बन गई थी कि लद्दाख के बच्चे पढ़ाई में कमजोर हैं।
सोनम वांगचुक ने इस सोच को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि समस्या बच्चों में नहीं, बल्कि शिक्षा प्रणाली में है। जब किसी बच्चे को उसकी भाषा, संस्कृति और स्थानीय परिस्थितियों से अलग शिक्षा दी जाएगी, तो वह सीखने में कठिनाई महसूस करेगा। इसी सोच ने SECMOL की नींव रखी।
SECMOL की कार्यप्रणाली कैसे अलग है?
SECMOL में पढ़ाई केवल किताबों तक सीमित नहीं रहती। यहाँ छात्रों को वास्तविक जीवन से जुड़े अनुभवों के माध्यम से सीखने का अवसर मिलता है।
उदाहरण के लिए—
- छात्र स्वयं सौर ऊर्जा (Solar Energy) से चलने वाली प्रणालियों को समझते हैं।
- खेती और जल संरक्षण जैसे विषयों पर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है।
- भवन निर्माण, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय संसाधनों के उपयोग की शिक्षा दी जाती है।
- विद्यार्थियों को नेतृत्व (Leadership), टीमवर्क और समस्या समाधान की क्षमता विकसित करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
इस मॉडल का उद्देश्य ऐसे युवा तैयार करना है जो अपने समाज की जरूरतों को समझें और उनके समाधान खोज सकें।
सोलर कैंपस बना पूरी दुनिया के लिए उदाहरण
SECMOL का कैंपस अपने आप में एक अनोखा उदाहरण है। यहाँ अधिकांश इमारतें स्थानीय मिट्टी, पत्थर और पारंपरिक तकनीकों से बनाई गई हैं।
सर्दियों में जब लद्दाख का तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है, तब भी इन भवनों में बिना अधिक बिजली खर्च किए रहने योग्य तापमान बनाए रखा जाता है। इसका कारण है—सौर ऊर्जा का प्रभावी उपयोग और पर्यावरण के अनुकूल डिज़ाइन।
यही वजह है कि दुनिया के कई देशों से छात्र, शिक्षक और शोधकर्ता इस मॉडल को देखने लद्दाख पहुँचते हैं।
क्या SECMOL केवल पढ़ाई कराता है?
नहीं।
SECMOL का उद्देश्य केवल शिक्षा देना नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है।
यहाँ छात्रों को यह सिखाया जाता है कि किसी भी समस्या का समाधान केवल सरकार से उम्मीद करने के बजाय स्वयं भी खोजा जा सकता है।
यही सोच आगे चलकर कई सामाजिक और पर्यावरणीय नवाचारों की प्रेरणा बनी।
Ice Stupa क्या है?
लद्दाख में खेती की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है पानी की कमी।
सर्दियों में यहाँ भारी मात्रा में बर्फ गिरती है, लेकिन जब वसंत ऋतु में किसानों को सिंचाई के लिए पानी की सबसे अधिक जरूरत होती है, तब तक अधिकांश प्राकृतिक बर्फ पिघल चुकी होती है। परिणामस्वरूप खेती प्रभावित होती है।
इसी समस्या का समाधान खोजने के लिए सोनम वांगचुक और उनकी टीम ने Ice Stupa की अवधारणा विकसित की।
Ice Stupa कैसे काम करता है?
Ice Stupa एक कृत्रिम बर्फ का शंकु (Artificial Ice Cone) होता है।
सर्दियों में ऊँचाई वाले क्षेत्रों से आने वाले पानी को पाइपों की सहायता से नीचे लाया जाता है। अत्यधिक ठंड के कारण यह पानी फव्वारे की तरह ऊपर निकलकर धीरे-धीरे जमने लगता है और एक विशाल शंकु के आकार की बर्फ बन जाती है।
इसका आकार स्तूप (Stupa) जैसा दिखाई देता है, इसलिए इसे Ice Stupa कहा गया।
Ice Stupa का सबसे बड़ा फायदा
गर्मी शुरू होने पर यह बर्फ धीरे-धीरे पिघलती है।
इससे—
- किसानों को समय पर सिंचाई के लिए पानी मिलता है।
- पानी लंबे समय तक उपलब्ध रहता है।
- खेती पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- जल संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
- प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होता है।
यह तकनीक विशेष रूप से उन पर्वतीय क्षेत्रों के लिए उपयोगी मानी जाती है जहाँ ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और जल संकट बढ़ रहा है।
क्या Ice Stupa ने पूरी समस्या हल कर दी?
ऐसा कहना सही नहीं होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार Ice Stupa जल संकट का एक उपयोगी स्थानीय समाधान है, लेकिन यह Climate Change की समस्या का पूर्ण समाधान नहीं है।
फिर भी इस नवाचार ने दुनिया का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार विकसित तकनीकें पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
इसी कारण Ice Stupa को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया।
पर्यावरण संरक्षण के लिए सोनम वांगचुक का योगदान
सोनम वांगचुक का मानना है कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि सही योजना बनाई जाए, तो दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।
उनके अधिकांश कार्य इसी सोच पर आधारित हैं।
उन्होंने वर्षों से लद्दाख में ऐसे मॉडल विकसित करने पर जोर दिया जो कम संसाधनों में अधिक उपयोगी साबित हों।
उनके प्रमुख पर्यावरणीय प्रयासों में शामिल हैं—
1. सौर ऊर्जा को बढ़ावा
उन्होंने ऐसे भवनों और संस्थानों को बढ़ावा दिया जो Solar Energy का अधिकतम उपयोग करें और पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करें।
2. जल संरक्षण
Ice Stupa जैसी तकनीक के माध्यम से उन्होंने जल संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयोग किए।
3. स्थानीय संसाधनों का उपयोग
उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि विकास कार्यों में स्थानीय सामग्री और स्थानीय ज्ञान का सम्मान किया जाए।
4. सतत विकास (Sustainable Development)
उनकी सोच केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित नहीं है। वे ऐसे विकास मॉडल का समर्थन करते हैं जिससे आने वाली पीढ़ियों को भी प्राकृतिक संसाधन सुरक्षित मिल सकें।
क्यों माना जाता है कि उनका काम भविष्य की जरूरत है?
आज पूरी दुनिया Climate Change, Water Scarcity और Sustainable Development जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है।
ऐसे समय में सोनम वांगचुक के प्रयोग यह बताते हैं कि बड़े समाधान हमेशा बड़े बजट से नहीं आते। कई बार स्थानीय लोगों की समझ, वैज्ञानिक सोच और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर भी प्रभावी समाधान विकसित किए जा सकते हैं।
इसी कारण शिक्षा, पर्यावरण और सामाजिक नवाचार के क्षेत्र में उनका काम भारत ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बना
लद्दाख के अधिकारों के लिए सोनम वांगचुक का शांतिपूर्ण आंदोलन
सोनम वांगचुक केवल शिक्षा और पर्यावरण तक ही सीमित नहीं रहे। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने लद्दाख के लोगों के अधिकारों, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय पहचान को लेकर भी अपनी आवाज़ बुलंद की। उनका मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों का विकास वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों, संस्कृति और पर्यावरण को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश (Union Territory) का दर्जा मिला। हालांकि, इसके साथ ही कुछ संवैधानिक सुरक्षा व्यवस्थाएँ लागू नहीं रहीं, जिन्हें लेकर स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ी।
सोनम वांगचुक ने कहा कि लद्दाख का भविष्य केवल सड़कें और इमारतें बनाने से सुरक्षित नहीं होगा। यदि यहाँ के ग्लेशियर, पहाड़, जल स्रोत, संस्कृति और स्थानीय लोगों के अधिकार सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो विकास का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
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आंदोलन की मुख्य मांगें क्या थीं?
सोनम वांगचुक और कई सामाजिक संगठनों ने मुख्य रूप से चार प्रमुख मुद्दे उठाए—
- लद्दाख के पर्यावरण की बेहतर सुरक्षा।
- स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा।
- रोजगार और भूमि से जुड़े हितों को सुरक्षित रखना।
- क्षेत्र के लिए अधिक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था।
इन मांगों का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करना नहीं था, बल्कि लद्दाख के दीर्घकालिक हितों की ओर ध्यान आकर्षित करना था।
उन्होंने उपवास (Fast) और Protest क्यों किया?
सोनम वांगचुक का मानना रहा है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना हर नागरिक का अधिकार है। इसी सोच के साथ उन्होंने कई बार शांतिपूर्ण उपवास (Fast) और जन-जागरूकता अभियान चलाए।
उनका कहना था कि लद्दाख केवल पर्यटन का केंद्र नहीं है, बल्कि यह हिमालयी पारिस्थितिकी (Himalayan Ecosystem) का एक बेहद संवेदनशील हिस्सा है। यदि यहाँ अनियोजित विकास हुआ, तो उसका प्रभाव केवल लद्दाख तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे उत्तर भारत के जल स्रोतों और पर्यावरण पर भी पड़ सकता है।
उनके उपवास का उद्देश्य सरकार से टकराव नहीं, बल्कि संवाद (Dialogue) की आवश्यकता पर ज़ोर देना था। उन्होंने कई अवसरों पर नागरिकों से भी अपील की कि विरोध हमेशा शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों से किया जाना चाहिए।
समाज और देश पर उनके काम का प्रभाव
सोनम वांगचुक के कार्यों का प्रभाव केवल लद्दाख तक सीमित नहीं रहा। शिक्षा, पर्यावरण और सामाजिक नवाचार के क्षेत्र में उनके प्रयोगों ने देशभर के युवाओं, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं को प्रेरित किया।
1. शिक्षा में नई सोच
उन्होंने यह साबित किया कि शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं होनी चाहिए। यदि पढ़ाई को स्थानीय जीवन और व्यावहारिक अनुभवों से जोड़ा जाए, तो छात्र अधिक प्रभावी ढंग से सीखते हैं।
2. Innovation को बढ़ावा
उन्होंने युवाओं को यह संदेश दिया कि नवाचार (Innovation) केवल बड़ी प्रयोगशालाओं में नहीं होता। यदि किसी समस्या को गहराई से समझा जाए, तो उसका समाधान स्थानीय स्तर पर भी खोजा जा सकता है।
3. पर्यावरण के प्रति जागरूकता
Ice Stupa जैसे प्रयोगों ने लोगों का ध्यान जल संरक्षण और Climate Change जैसी गंभीर समस्याओं की ओर आकर्षित किया।
4. स्थानीय विकास का मॉडल
उन्होंने यह भी दिखाया कि विकास की योजनाएँ हर क्षेत्र की भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार बनाई जानी चाहिए।
भारत के युवा सोनम वांगचुक से क्या सीख सकते हैं?
सोनम वांगचुक का जीवन कई महत्वपूर्ण सीख देता है।
समस्याओं से भागिए नहीं, समाधान खोजिए
उन्होंने हमेशा शिकायत करने के बजाय समाधान तैयार करने पर ध्यान दिया।
सीखना कभी बंद मत कीजिए
इंजीनियर बनने के बाद भी उन्होंने लगातार नए प्रयोग किए और नई चीज़ें सीखीं।
समाज के लिए काम करना भी सफलता है
उन्होंने यह दिखाया कि सफलता केवल बड़ी नौकरी या अधिक आय तक सीमित नहीं होती। यदि आपका काम समाज के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है, तो वही सबसे बड़ी उपलब्धि है।
प्रकृति का सम्मान करें
उनके सभी नवाचार प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर किए गए। यह सोच आज के समय में पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
नेतृत्व का मतलब सेवा है
उन्होंने हमेशा लोगों के बीच रहकर काम किया। उनका नेतृत्व आदेश देने के बजाय प्रेरित करने पर आधारित रहा।
सोनम वांगचुक को मिले पुरस्कार और सम्मान
अपने उल्लेखनीय कार्यों के लिए सोनम वांगचुक को भारत और विदेशों में कई सम्मान प्राप्त हुए। इनमें प्रमुख हैं—
- Ramon Magsaysay Award (2018) – शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए।
- Rolex Award for Enterprise (2016) – Ice Stupa परियोजना के लिए।
- Global Award for Sustainable Architecture (2017)।
- भारत और विदेश की कई विश्वविद्यालयों एवं संस्थाओं द्वारा विशेष सम्मान।
इन पुरस्कारों से अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके कार्यों को दुनिया भर में अध्ययन और चर्चा का विषय बनाया गया।
सोनम वांगचुक से जुड़े कुछ रोचक तथ्य
निष्कर्ष
सोनम वांगचुक का जीवन इस बात का प्रमाण है कि बदलाव लाने के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। सही सोच, निरंतर प्रयास और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना भी असंभव लगने वाले कार्यों को संभव बना सकती है।
उन्होंने शिक्षा को नई दिशा दी, जल संरक्षण के लिए Ice Stupa जैसा अभिनव समाधान प्रस्तुत किया, पर्यावरण संरक्षण को अपनी प्राथमिकता बनाया और लद्दाख के लोगों की आवाज़ को शांतिपूर्ण तरीके से राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया।
उनके सभी विचारों से हर व्यक्ति सहमत हो, यह आवश्यक नहीं है। लोकतांत्रिक समाज में अलग-अलग मत होना स्वाभाविक है। लेकिन यह निर्विवाद है कि शिक्षा, नवाचार और पर्यावरण के क्षेत्र में उनके योगदान ने भारत और दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है।
आज के युवाओं के लिए उनका सबसे बड़ा संदेश शायद यही है—समस्या कितनी भी बड़ी क्यों न हो, यदि हम उसे समझने और समाधान खोजने की ईमानदार कोशिश करें, तो बदलाव संभव है।
Frequently Asked Question
सोनम वांगचुक भारतीय इंजीनियर, शिक्षा सुधारक, नवाचारक और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने लद्दाख में शिक्षा और जल संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
SECMOL (Students’ Educational and Cultural Movement of Ladakh) एक वैकल्पिक शिक्षा संस्थान है, जहाँ छात्रों को व्यावहारिक और स्थानीय परिस्थितियों पर आधारित शिक्षा दी जाती है।
Ice Stupa एक कृत्रिम बर्फ संरचना है, जिसे सर्दियों में तैयार किया जाता है ताकि गर्मियों में पिघलने वाला पानी खेती और सिंचाई के लिए उपयोग किया जा सके।
उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय लोगों के अधिकार, भूमि और रोजगार से जुड़े मुद्दों तथा लद्दाख के दीर्घकालिक हितों की सुरक्षा के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन किए।
उन्हें Ramon Magsaysay Award (2018), Rolex Award for Enterprise (2016) और कई अन्य राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं।
नहीं। फिल्म का “Phunsukh Wangdu” पात्र आंशिक रूप से उनके जीवन और कार्यों से प्रेरित माना जाता है, लेकिन फिल्म उनकी आधिकारिक जीवनी नहीं है।